राजेश खन्ना पुण्यतिथि 2026: बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार 'काका' की कहानी
18 जुलाई को राजेश खन्ना की पुण्यतिथि पर जानिए ‘काका’ के सुपरस्टार बनने की कहानी, आराधना से मिली ऐतिहासिक सफलता, रिकॉर्डतोड़ हिट फिल्मों का सफर, डिंपल कपाड़िया से शादी और भारतीय सिनेमा पर उनके अमिट प्रभाव के बारे में।
नई दिल्ली: हर साल 18 जुलाई को पूरा देश हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना को श्रद्धांजलि देता है। ‘काका’ के नाम से मशहूर राजेश खन्ना ने भारतीय फिल्म उद्योग में स्टारडम की ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसे आज भी मिसाल माना जाता है। उनकी मुस्कान, संवाद बोलने का अनोखा अंदाज, भावपूर्ण अभिनय और सदाबहार गीतों ने उन्हें करोड़ों दिलों की धड़कन बना दिया।
18 जुलाई 2012 को 69 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया था। वर्ष 2026 में उनकी 14वीं पुण्यतिथि पर भी उनकी फिल्में, उनके गीत और उनके यादगार किरदार दर्शकों के दिलों में उसी तरह जीवित हैं। रोमांटिक फिल्मों से लेकर संवेदनशील सामाजिक कहानियों तक, राजेश खन्ना का योगदान भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
जतिन खन्ना से राजेश खन्ना बनने तक का सफर
29 दिसंबर 1942 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था। उनका पालन-पोषण उनके रिश्तेदार चुन्नीलाल और लीलावती खन्ना ने किया, जो बाद में मुंबई आकर बस गए। स्कूल और कॉलेज के दिनों में रंगमंच से जुड़ते हुए उनके भीतर अभिनय का जुनून पैदा हुआ। उन्होंने सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल और बाद में के.सी. कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।
साल 1965 में आयोजित फिल्मफेयर-यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स ऑल इंडिया टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। हजारों प्रतिभागियों को पीछे छोड़कर मिली इस सफलता ने उन्हें फिल्मों तक पहुंचने का अवसर दिया।
‘आख़िरी ख़त’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
1966 में चेतन आनंद निर्देशित ‘आख़िरी ख़त’ से उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी, लेकिन समीक्षकों ने उनके अभिनय की सराहना की। इतना ही नहीं, यह फिल्म ऑस्कर के सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म वर्ग के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि भी बनी।
शुरुआती फिल्मों में उनकी प्रतिभा साफ दिखाई दी, लेकिन असली पहचान अभी मिलनी बाकी थी।
‘आराधना’ ने बदल दी किस्मत
1969 में रिलीज हुई शक्ति सामंत निर्देशित फिल्म ‘आराधना’ ने राजेश खन्ना को रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी और फिल्म के सदाबहार गीत—‘मेरे सपनों की रानी’ और ‘रूप तेरा मस्ताना’—ने पूरे देश को उनका दीवाना बना दिया।
इसके बाद पूरे देश में ‘राजेश खन्ना मेनिया’ देखने को मिला। उनके बंगले के बाहर प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी। कई प्रशंसक उन्हें खून से लिखे पत्र भेजते थे, उनकी तस्वीरों को चूमते थे और सिर्फ एक झलक पाने के लिए घंटों इंतजार करते थे। भारतीय सिनेमा में किसी अभिनेता के लिए ऐसी दीवानगी पहले कभी नहीं देखी गई थी।
लगातार सुपरहिट फिल्मों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
1969 से 1971 के बीच राजेश खन्ना ने लगातार कई सुपरहिट फिल्में देकर इतिहास रच दिया। यह रिकॉर्ड आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे शानदार दौरों में गिना जाता है।
दो रास्ते, कटी पतंग, सफर, आनंद, हाथी मेरे साथी और अमर प्रेम जैसी फिल्मों ने लगातार बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान बनाए। खासकर मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों की पहली पसंद बन गई।
1971 में ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित ‘आनंद’ को उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है। एक असाध्य बीमारी से जूझते हुए भी जीवन को मुस्कुराकर जीने वाले व्यक्ति का उनका किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनय में शामिल है। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी मिला।
दिलचस्प बात यह रही कि ‘सफर’ और ‘आनंद’ जैसी कई सफल फिल्मों में उनका किरदार अंत में मर जाता है, लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता कम होने के बजाय और बढ़ती चली गई।
चार दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने 160 से ज्यादा फीचर फिल्मों में काम किया और लंबे समय तक हिंदी सिनेमा में सबसे अधिक सोलो हीरो फिल्मों वाले अभिनेता के रूप में पहचान बनाई।
दर्शकों के दिलों में क्यों बस गए राजेश खन्ना
राजेश खन्ना केवल रोमांटिक हीरो नहीं थे। चेहरे के भाव, सहज अभिनय और संवादों को भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत करने की उनकी कला उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। वे हर किरदार को इतनी सच्चाई से निभाते थे कि दर्शक खुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस करते थे।
फिल्म ‘आनंद’ का उनका प्रसिद्ध लाइन—
“बाबूमोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं।”
आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय संवादों में गिना जाता है।
यादगार ऑन-स्क्रीन जोड़ियां और संगीत
राजेश खन्ना ने मुमताज, शर्मिला टैगोर, आशा पारेख, हेमा मालिनी, जीनत अमान और मौसमी चटर्जी जैसी कई अभिनेत्रियों के साथ शानदार फिल्में दीं।
उनकी फिल्मों के गीत भी उतने ही लोकप्रिय रहे। किशोर कुमार की आवाज राजेश खन्ना की पहचान बन गई, जबकि आर.डी. बर्मन, एस.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकारों ने उनकी फिल्मों को अमर संगीत दिया।
स्टारडम के बाद का दौर
हर बड़े सितारे की तरह राजेश खन्ना के जीवन में भी उतार-चढ़ाव आए। 1970 के दशक के मध्य में अमिताभ बच्चन के नेतृत्व में एक्शन फिल्मों का दौर शुरू हुआ और दर्शकों की पसंद बदलने लगी।
इसके बावजूद राजेश खन्ना ने फिल्मों, टेलीविजन और विज्ञापनों में लगातार काम किया तथा अपने अभिनय से दर्शकों का सम्मान बनाए रखा।
डिंपल कपाड़िया से शादी और परिवार
मार्च 1973 में राजेश खन्ना ने उभरती अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया से शादी किया। उस समय यह शादी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे चर्चित शादियों में शामिल थी। उनकी दो बेटियां हुईं—ट्विंकल खन्ना, जिन्होंने बाद में लेखिका और कॉलमिस्ट के रूप में पहचान बनाई तथा अभिनेता अक्षय कुमार से विवाह किया, और रिंकी खन्ना।
1982 में दोनों अलग हो गए, हालांकि उन्होंने कभी औपचारिक रूप से तलाक नहीं लिया। जीवन के अंतिम वर्षों में डिंपल कपाड़िया फिर उनके साथ रहीं और बीमारी के दौरान उनकी देखभाल की।
राजनीति में भी आजमाई किस्मत
1990 के दशक की शुरुआत में राजेश खन्ना ने राजनीति में कदम रखा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। 1992 में उन्होंने नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे और 1996 तक सांसद रहे। हालांकि राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद उनका सबसे बड़ा परिचय हमेशा एक अभिनेता का ही रहा।
अंतिम समय और विदाई
जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी तबीयत लगातार खराब रहने लगी और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। 18 जुलाई 2012 को मुंबई के बांद्रा स्थित अपने प्रसिद्ध बंगले ‘आशीर्वाद’ में उन्होंने अंतिम सांस ली।
भारी बारिश के बावजूद हजारों प्रशंसक उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। उनके निधन के बाद 2013 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से मरणोपरांत सम्मानित किया।
सम्मान और उपलब्धियां
राजेश खन्ना को अपने शानदार करियर के दौरान अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। प्रमुख सम्मान इस प्रकार हैं—
- ‘सच्चा झूठा’ (1971) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार।
- ‘आनंद’ (1972) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार।
- चार दशकों में कई फिल्मफेयर नामांकन।
- वर्ष 2005 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड।
- 2013 में मरणोपरांत पद्म भूषण।
चार दशक से अधिक लंबे करियर में उन्होंने 160 से ज्यादा फीचर फिल्मों के साथ अनेक विशेष प्रस्तुतियों में भी अभिनय किया।
हमेशा अमर रहेगा ‘काका’ का जादू
राजेश खन्ना की कहानी केवल एक अभिनेता की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा में स्टारडम के नए युग की शुरुआत की कहानी है। उन्होंने लोकप्रियता, अभिनय और दर्शकों के प्रेम के ऐसे मानक स्थापित किए, जिन्हें आज भी याद किया जाता है।
आज भी उनकी फिल्में, गीत और संवाद नई पीढ़ी को उतने ही आकर्षित करते हैं जितना अपने समय में करते थे। हर वर्ष 18 जुलाई को करोड़ों प्रशंसक उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हैं और उनकी फिल्मों के माध्यम से उनके योगदान को नमन करते हैं।
उनका अमर संवाद—
“बाबूमोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं।”
सिर्फ एक फिल्मी की लाइन नहीं, बल्कि उनके जीवन का सार भी बन गया। उनका जीवन भले सीमित वर्षों का रहा, लेकिन भारतीय सिनेमा पर उनकी छाप हमेशा अमिट रहेगी। बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और यादों का अभिन्न हिस्सा बने रहेंगे।
